धूल में लिखी पटकथा
रेत
में लिखी पटकथा
मरुभूमि की धूल
में
यह कहानी बहुत
पहले लिख दी गई थी,
उससे भी पहले
जब पहली मिसाइल ने
आकाश को चीरकर
आग की लकीर खींची
थी।
हम संसार की पत्थर
की सीढ़ियों पर बैठे थे,
एक मौन दर्शक-समूह
की तरह,
होंठ दबाए,
देखते रहे उन
लोगों को
जो आग की ओर बढ़ते
चले जा रहे थे
भारी कदमों से—
मानो वे विजय की
ओर जा रहे हों,
जबकि रास्ता
चुपचाप
कब्र की ओर मुड़
रहा था।
रेत पर लाल रेखाएँ
खींची गईं,
फिर उन्हें लाँघा
गया,
फिर दोबारा खींचा
गया,
और अंत में वे
खून की लहर में
मिट गईं।
हर अंतिम चेतावनी
एक युद्ध-ढोल की
तरह गूँजती रही,
हर कूटनीतिक सफलता
एक मुखौटा बन गई
जिसके पीछे क्रोध
की आग छिपी थी।
अभिमान उठा—
साँप की तरह
कुंडली मारता हुआ,
और आकाश से गिरती
बिजली-सी शक्ति
एक तेज़ और साफ
अंत का सपना देखती रही।
पर त्रासदी का अंत
कभी साफ नहीं
होता।
जो वार नायक को
गिरा देता है,
वही और आवाज़ों को
मंच पर बुला लेता
है।
और हम—दर्शक—
सबसे दुखद भूमिका
में हैं।
हम गिनते हैं
मृतकों को,
देखते हैं टूटते
नगरों को,
और समझते हैं देर
से
कि विजय की सुबह
अक्सर शाम की चिता
बन जाती है।
अब मंच शांत है।
सायरन थक चुके हैं,
और शहर की हवा
राख से भरी हुई
है।
हम विजेता का
स्मारक नहीं बनाते,
क्योंकि त्रासदी
में
कोई विजेता नहीं
होता।
हम भूल की स्मृति
बनाते हैं—
नमक का एक स्तंभ,
जो हमें याद
दिलाता है
कि अभिमान की आग
अक्सर अपने ही घर
को जला देती है।
और फिर हम
भोर की ठंडी रोशनी
में
धीरे-धीरे आगे
बढ़ते हैं,
यह आशा लिए कि
अगली पीढ़ी
धरती की धूल में
एक नई और समझदार
कहानी लिखेगी।
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